Thursday, 12 June 2014



वे दरख़्त !!!
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उन दरख्तों का तिलिस्मी साया !
जकड लेता है जब अपनी छाँव तले !!

भर देता है
अहसास
सुस्ताने का
कुछ पल ठिठक जाने का
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बिछा देता है 
नर्म, मुलायम, कोमल पत्तियां 
प्रेम की गर्म सलाखों पर चले
पावों के नीचे
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उसूल गुरुर को तोडकर
काल्पनिक, स्वप्निल हयात में
विचरते हुए
दुआओं, को उठ जाते हैं हाथ
उनकी सलामती को
संतुष्टि, खुशहाली को !!!!...... @ सीमा असीम